इंटरनेशनल नर्सेस डे विशेष: सेवा और समर्पण का मानवीय चेहरा:

अस्पताल की परिकल्पना बिना उस सफेद वर्दी और चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान के अधूरी है, जिसे हम ‘नर्स’ कहते हैं। आज 12 मई है-दुनिया भर की उन ‘बैकबोन’ का दिन, जो चिकित्सा जगत को अपने कंधों पर थामे हुए हैं।
इतिहास: ‘लेडी विद द लैंप’ की विरासत:
नर्सिंग को सम्मानजनक पहचान दिलाने का श्रेय फ्लोरेंस नाइटिंगेल को जाता है। 1850 के क्रीमिया युद्ध में लालटेन लेकर घायलों की सेवा करने वाली उस महिला ने एक ऐसी परंपरा शुरू की, जो आज लाखों लोगों का जीवन बचा रही है।
1953: डोरथी सदरलैंड द्वारा इस दिन का पहली बार प्रस्ताव।
1974: आधिकारिक रूप से 12 मई को ‘इंटरनेशनल नर्सेस डे’ घोषित किया गया।
बीमारी और मरीज के बीच की मजबूत ढाल:
डॉक्टर इलाज तय करता है, लेकिन उस इलाज को धरातल पर नर्स उतारती है। फरीदकोट मेडिकल कॉलेज की रिटायर्ड नर्सिंग ऑफिसर आशा रानी के अनुसार नर्सिंग स्टाफ अस्पताल की रीढ़ है। मरीज के चिड़चिड़ेपन को सहकर भी उसे परिवार की तरह संभालना ही हमारी असली जीत है।
कोरोना काल; जब रक्षक बने देवदूत:
कोविड-19 के दौर में जब दुनिया घरों में कैद थी, तब ये नर्सें पीपीई किट में घंटों पसीना बहा रही थीं। उन्होंने न केवल इलाज किया, बल्कि अपनों से बिछड़े शवों का अंतिम संस्कार कर मानवता की नई मिसाल पेश की।
क्यों खास है यह पेशा?
धैर्य की पराकाष्ठा: शारीरिक और मानसिक दबाव के बावजूद निरंतर सेवा।
सैनिक जैसा जज्बा: वार्डों में रहकर मौत से लड़ रहे मरीजों की ढाल बनना।
भावनात्मक उपचार: दवा से ज्यादा नर्स का मीठा व्यवहार और अटूट विश्वास मरीज को जल्दी ठीक करता है।
हमारा संकल्प:
आज का दिन केवल औपचारिक धन्यवाद का नहीं है, बल्कि नर्सों के अधिकारों, सुरक्षा और उनके सम्मान की रक्षा का संकल्प लेने का है। मुश्किल हालातों में मुस्कान के साथ सेवा करना ही इनका धर्म है।
‘यस न्यूज़’ की ओर से दुनिया भर की तमाम नर्सों को उनकी निःस्वार्थ सेवा के लिए शत-शत नमन।
रिपोर्ट: अलेक्जेंडर डिसूजा, फरीदकोट।
फ्लोरेंस नाइटिंगेल की फ़ाइल फोटो:




