देवतालाब महाविद्यालय में ‘सिस्टमेटिक लूट’ का बड़ा खुलासा
सुसाइड केस के साए में फर्जी कर्मचारियों को भुगतान, छात्रों की फीस पर डाका!
रीवा ब्यूरो चीफ शुभम तिवारी

देवतालाब (मऊगंज)। सरदार वल्लभभाई पटेल शासकीय महाविद्यालय देवतालाब इन दिनों गंभीर आरोपों के घेरे में है। एक ओर महाविद्यालय में पदस्थ लैब अटेंडेंट का सुसाइड मामला प्रदेश स्तर तक गूंज रहा है, तो दूसरी ओर अब ऐसे खुलासे सामने आ रहे हैं, जो पूरे संस्थागत ढांचे पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, जिस लैब अटेंडेंट का सुसाइड मामला चर्चा में है, वह कथित रूप से नियमित रूप से कॉलेज नहीं आती थी, बावजूद इसके उसे लगातार भुगतान किया जाता रहा। यदि यह सच है, तो यह मामला सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि गहरे स्तर पर चल रहे वित्तीय और प्रशासनिक खेल की तरफ इशारा करता है।
केवल एक नहीं… पूरा ‘नेटवर्क’?
जानकारी के अनुसार, यह मामला अकेला नहीं है। महाविद्यालय में करीब एक दर्जन ऐसे “कर्मचारी” बताए जा रहे हैं—
* जो कॉलेज में दिखाई नहीं देते
* जिनकी उपस्थिति का कोई रिकॉर्ड नहीं
* जिनके कार्य का कोई स्पष्ट विवरण नहीं
फिर भी, जनभागीदारी निधि से उनकी जेबें हर महीने भरी जा रही हैं,यानी “कागजों में कर्मचारी—जमीन पर गायब—और भुगतान जारी!”
छात्रों की फीस बनी ‘कैश मशीन, सुविधाएं शून्य
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन भुगतानों का स्रोत क्या है?
छात्रों का आरोप है कि उनसे विकास, सुविधाओं और संसाधनों के नाम पर ली जाने वाली फीस को ही इस कथित खेल में झोंका जा रहा है।
लाइब्रेरी, लैब, बुनियादी सुविधाएं—सब उपेक्षित,
और दूसरी तरफ “गैरहाजिर कर्मचारियों” पर खर्च—यह सीधे-सीधे छात्रों के साथ आर्थिक अन्याय और शोषण का मामला बनता जा रहा है।
बिना योग्यता, बिना प्रक्रिया—सीधी एंट्री!
मामले में यह भी सामने आया है कि कुछ कथित कर्मचारी ऐसे हैं जिनके पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता तक नहीं है।
यदि यह सही है, तो यह न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि योग्य युवाओं के अधिकारों पर भी कुठाराघात है।
RTI में टालमटोल—क्या छुपाया जा रहा है?
जब पूरे मामले की जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मांगी गई, तो जिम्मेदार अधिकारियों ने स्पष्ट जवाब देने के बजाय बहानेबाजी शुरू कर दी।
कानून के तहत निर्धारित समय में जानकारी देना अनिवार्य है—ऐसे में चुप्पी और टालमटोल खुद संदेह को और गहरा कर रही है।
सुसाइड केस से जुड़ते सवाल
लैब अटेंडेंट के सुसाइड ने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। अब सवाल उठ रहे हैं—
* क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत घटना थी या इसके पीछे संस्थागत दबाव भी था?
* क्या फर्जी भुगतान और संदिग्ध नियुक्तियों का यह नेटवर्क लंबे समय से चल रहा है?
* और क्या इस पूरे तंत्र में जवाबदेही तय होगी?
संरक्षण की चर्चा—जांच की कसौटी
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि पूरा मामला प्रभावशाली संरक्षण में चल रहा है। यदि ऐसा है, तो यह सिर्फ वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।
छात्रों में आक्रोश,”फीस पढ़ने के लिए देते हैं बैठे बिठाए कर्मचारियों के लिए नहीं”
छात्रों का गुस्सा अब खुलकर सामने आ रहा है। उनका कहना है—
“हम पढ़ाई के लिए फीस देते हैं, किसी के ‘बैठे-बिठाए वेतन’ के लिए नहीं।”
छात्रों और नागरिकों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय, निष्पक्ष जांच की मांग की है—खासतौर पर सुसाइड केस और फर्जी भुगतान के बीच संभावित कनेक्शन को लेकर।
मामला कलेक्टर-कमिश्नर तक,अब फैसला प्रशासन के हाथ में
इसकी शिकायत कलेक्टर मऊगंज और कमिश्नर रीवा से करने की तैयारी है,यह मामला अब साधारण अनियमितता से आगे बढ़कर “सिस्टमेटिक गड़बड़ी” का रूप ले चुका है।
अगर समय रहते सख्त जांच और कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मुद्दा न सिर्फ महाविद्यालय, बल्कि पूरे क्षेत्र की साख पर गहरा असर डाल सकता है।
अब देखना होगा—क्या सच सामने आएगा, या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा।


