पति के बिना जी लूंगी लाशों के बिना नहीं——

जब लोग अपनों की आखिरी विदाई देकर लौट जाते हैं, तब कोई एक इंसान होता है जो उस आ’ग के साथ रह जाता है।”पश्चिम बंगाल की टुम्पा दास की कहानी साहस, मजबूरी और समाज से ल’ड़ने की मिसाल है। वह कोलकाता के बड़िपुर श्मशान में ला’शें ज’ला’ने वाली डोम समुदाय की पहली महिला हैं। साल 2014 में पिता की मौत के बाद उनके कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। घर में खाने तक के लाले पड़ गए थे, मां बीमार थीं और बहन गर्भवती। ऐसे में श्मशान का काम ही उनके सामने आखिरी सहारा बनकर आया।
सिर्फ 22 साल की उम्र में टुम्पा ने चि’ता सजाने का काम शुरू किया। शुरुआत बेहद कठिन रही। लोग ताने मारते, कहते—“लड़की होकर ये काम कैसे करेगी?” कई लोग उनकी बनाई चि’ता को छूने से भी मना कर देते थे। गांव में लोग उन्हें अ’छू’त की नजर से देखने लगे। लेकिन टुम्पा ने हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को इस काम में मजबूत बना लिया और लोगों ने भी उन्हें स्वीकार करना शुरू कर दिया।
इस सफर में उन्हें सिर्फ ताने ही नहीं, बल्कि ब’दतमी’जी भी झेलनी पड़ी। कई बार श्मशान में आए लोगों ने उनका अ’पमा’न किया। किसी ने फोन नंबर मांगा, की कोशिश की । लेकिन टुम्पा ने हर बार डटकर जवाब दिया और खुद के लिए खड़ी रहीं।
श्मशान में काम करते हुए उन्होंने जिंदगी के कई द’र्दना’क पहलू देखे। छोटी ब’च्ची की ला’श को जलाते समय उनके हाथ कांप गए थे। ऐसे कई पल हैं जो आज भी उन्हें अंदर से झ’कझोर देते हैं। फिर भी वह हर दिन सुबह से शाम तक इस काम को पूरी जिम्मेदारी से निभाती हैं।
इस काम की वजह से उनकी शादी भी नहीं हो पाई। लोग उन्हें बहू बनाने से कतराते रहे। कई रिश्ते आए, लेकिन सच जानकर लौट गए। आखिरकार टुम्पा ने फैसला कर लिया कि वह शादी से ज्यादा अपने काम को चुनेंगी।
आज टुम्पा कहती हैं कि वह पति के बिना जिंदगी गुजार सकती हैं, लेकिन इस काम के बिना नहीं। ला’शों के बीच काम करते हुए उन्हें एक अजीब सा सुकून मिलता है। समाज की उपेक्षा और दर्द सहने के बावजूद उन्होंने अपने आत्मसम्मान और जिम्मेदारी को कभी नहीं छोड़ा—और यही उन्हें खास बनाता है।


