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धनात्मकता का अभिप्राय है—उत्साह, प्रवर्तन और कर्मशीलता की सहज क्षमता;

admin
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नरदेह स्वभावतः धनात्मक तत्त्वप्रधान माना गया है, जबकि नारीदेह ऋणात्मक तत्त्वप्रधान के रूप में अभिव्यक्त होता है।

धनात्मकता का अभिप्राय है—उत्साह, प्रवर्तन और कर्मशीलता की सहज क्षमता;

संस्थापक/अध्यक्ष-पंडित राजकुमार मिश्र

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और ऋणात्मकता का तात्पर्य है—संवरण, धारण एवं संचय की स्वाभाविक स्थिति।

अतः प्रत्येक नारी में एक विशिष्ट शक्ति निहित अवश्य रहती है, किन्तु वह सामान्यतः सुप्त अथवा निष्क्रिय अवस्था में स्थित होती है। इसी कारण नारी की प्रवृत्ति स्वभावतः आक्रामक न होकर धारणशील एवं संतुलनकारी होती है।

पुरुष के प्रथम शरीर की प्रवृत्ति धनात्मक होती है, जबकि उसका द्वितीय शरीर ऋणात्मक होता है। इसके विपरीत, स्त्री का प्रथम शरीर ऋणात्मक एवं द्वितीय शरीर धनात्मक स्वरूप का होता है। यही क्रम अन्य पंच शरीरों में भी विभिन्न स्तरों पर परिलक्षित होता है।

धन और ऋण—इन दोनों ध्रुवों के समन्वय से ही ऊर्जा का वास्तविक संकेन्द्रण एवं प्रवाह संभव होता है। योगतांत्रिक साधना में स्त्री-पुरुष के शरीरों के समुचित संतुलन से जो ऊर्जा उत्पन्न होती है, वही साधना का मुख्य आधार मानी गई है।

▪︎ प्रथम स्तर पर, पुरुष के धनात्मक शरीर और स्त्री के ऋणात्मक शरीर के संयोग से जो शक्ति उत्पन्न होती है, उसका प्रयोग मुख्यतः सृष्टि-रचना तक ही सीमित रहता है; क्योंकि यह ऊर्जा इन्द्रिय-आनन्द के स्तर पर ही समाप्त हो जाती है, अतः योगतांत्रिक साधना में इसका विशेष उपयोग नहीं माना गया है।

▪︎ द्वितीय शरीर के पारस्परिक संबंध से जो ऊर्जा प्रकट होती है, वही योगतांत्रिक साधना में सहायक सिद्ध होती है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि इस स्तर पर पुरुष का शरीर ऋणात्मक तथा स्त्री का धनात्मक स्वरूप ग्रहण करता है। इसी समन्वित ऊर्जा के माध्यम से योगतांत्रिक मंत्रों की जागृति संभव होती है।

▪︎ तृतीय शरीर में पुरुष की प्रवृत्ति पुनः धनात्मक एवं स्त्री की ऋणात्मक होती है। इस स्तर का संयोग अत्यन्त दिव्य ऊर्जा का संचार करता है, जिसके द्वारा साधक को पारलौकिक सहायता एवं सूक्ष्म मार्गदर्शन प्राप्त होने लगता है, जो उसके महत्त्वपूर्ण कार्यों में सहायक होता है।

▪︎ चतुर्थ शरीर तक पहुँचना अत्यन्त दुष्कर साधना का विषय है; किन्तु जो साधक इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, उसके लिए असंभव जैसा कुछ भी शेष नहीं रहता।
विशिष्ट मुद्राओं, आसनों एवं योगतांत्रिक क्रियाओं के माध्यम से जब साधक एवं साधिका के स्थूल शरीर की ऊर्जाएँ परस्पर समन्वित होती हैं, तब उस ऊर्जा से मूलाधार चक्र का उद्घाटन होता है।

साधना की प्रगति के साथ जब साधक भावमय स्तर पर प्रवेश करता है, तब उसी ऊर्जा के प्रभाव से स्वाधिष्ठान चक्र का भेदन होता है।

सूक्ष्म शरीर के समन्वय से मणिपुर चक्र तथा मनोमय स्तर की तीव्रता से अनाहत चक्र का जागरण होता है।

 चक्रों के भेदन के उपरांत ही साधक वास्तविक रूप से आध्यात्मिक एवं पारलौकिक लाभों का अनुभव करने में समर्थ होता है।

अतः यह स्पष्ट है कि योगतंत्र साधना में नारी की भूमिका अत्यन्त असाधारण एवं अनिवार्य है;

क्योंकि साधना की सफलता अथवा असफलता मुख्यतः नारी के सूक्ष्म विद्युत्-चुम्बकीय आभामंडल पर ही निर्भर करती है।

— संकल्प रामराज्य के द्वारा प्रसतुत


संस्थापक/अध्यक्ष-पंडित राजकुमार मिश्र

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