Ad imageAd image
d84ef9efc3d53b57ca3a957694261ad58b2c2b9e

अमरकंटक विश्वविद्यालय में दलित छात्र के उत्पीड़न और जातीय भेदभाव का गंभीर आरोप

admin
6 Min Read
इस खबर को शेयर करें

अमरकंटक विश्वविद्यालय में दलित छात्र के उत्पीड़न और जातीय भेदभाव का गंभीर आरोप

 

कुलपति से न्याय की गुहार, विभाग में अनधिकृत हस्तक्षेप और मानसिक प्रताड़ना पर उठे सवाल

 

- Advertisement -
Ad imageAd image

मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले स्थित IGNTU अमरकंटक एक बार फिर गंभीर विवादों के केंद्र में आ गया है। विश्वविद्यालय के बी.वोक (B.Voc) विभाग के एक नियमित छात्र वास्को ने विभाग में कथित मानसिक उत्पीड़न, जातिगत भेदभाव और अनधिकृत व्यक्तियों के हस्तक्षेप को लेकर माननीय कुलपति एवं कुलसचिव को विस्तृत शिकायती पत्र सौंपकर न्याय की गुहार लगाई है। छात्र का आरोप है कि विभागीय वातावरण इस कदर विषाक्त बना दिया गया है कि उसका शैक्षणिक भविष्य, सामाजिक सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य गहरे संकट में पहुंच गया है।

 

आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप से हटाया गया छात्र

शिकायत पत्र के अनुसार, बी.वोक विभाग के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में छात्र के खिलाफ लगातार आपत्तिजनक, भड़काऊ और छवि धूमिल करने वाले संदेश प्रसारित किए गए। जब छात्र ने तथ्यों और शालीन भाषा में अपना पक्ष रखने का प्रयास किया, तो उसे बिना किसी पूर्व सूचना, कारण बताओ नोटिस या लिखित आदेश के आधिकारिक छात्र समूह से बाहर कर दिया गया।

पीड़ित छात्र का कहना है कि इस कार्रवाई के कारण वह विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण शैक्षणिक सूचनाओं, विभागीय गतिविधियों, कक्षाओं और संवाद प्रक्रिया से पूरी तरह वंचित हो गया है, जो किसी भी छात्र के मौलिक शैक्षणिक अधिकारों का खुला उल्लंघन है।

- Advertisement -
Ad imageAd image

 

विभाग में “अनधिकृत व्यक्ति” की भूमिका पर गंभीर सवाल

छात्र ने गौरव सिंह नामक व्यक्ति की भूमिका को बेहद संदिग्ध और चिंताजनक बताया है। आरोप है कि उक्त व्यक्ति स्वयं को विभाग का प्रभावशाली सदस्य बताकर लगभग सभी आधिकारिक छात्र समूहों का एडमिन बना हुआ है और खुलेआम यह दावा करता है कि विभाग उसके इशारों पर संचालित होता है।

 

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि गौरव सिंह विश्वविद्यालय के अधिकृत कर्मचारी हैं, तो अब तक विभाग द्वारा उनकी नियुक्ति, पद और अधिकारों की कोई आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? छात्र ने मांग की है कि विश्वविद्यालय प्रशासन तत्काल स्पष्ट करे कि उक्त व्यक्ति किस सक्षम प्राधिकारी के आदेश पर विभागीय गतिविधियों में हस्तक्षेप कर रहा है।

 

शिक्षकों पर दबाव और भविष्य बर्बाद करने की धमकी का आरोप

मामले में यह भी आरोप लगाया गया है कि विभागाध्यक्ष द्वारा कुछ शिक्षकों पर दबाव बनवाकर छात्र के खिलाफ आवेदन लिखवाए गए तथा उसके शैक्षणिक भविष्य को बर्बाद करने की धमकियां दी गईं। यदि ये आरोप सत्य पाए जाते हैं, तो यह न केवल विश्वविद्यालय की गरिमा पर प्रश्नचिन्ह है बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक दुरुपयोग का गंभीर उदाहरण भी माना जाएगा।

 

जातिगत भेदभाव का आरोप, SC/ST सेल को भी भेजी गई शिकायत

दलित वर्ग से आने वाले पीड़ित छात्र ने आशंका जताई है कि उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण उसे सुनियोजित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। छात्र का कहना है कि यह मामला केवल व्यक्तिगत प्रताड़ना तक सीमित नहीं है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय की भावना पर सीधा हमला है।

शिकायत में प्रोफेसर विकास सिंह पर भी छात्र के खिलाफ कथित रूप से भ्रामक पीडीएफ दस्तावेज वायरल करने और गंभीर, निराधार आरोप लगाने की बात कही गई है। छात्र का दावा है कि उसके पास इन गतिविधियों से जुड़े ठोस डिजिटल साक्ष्य मौजूद हैं।

इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए छात्र ने शिकायत की प्रतिलिपि डीन स्टूडेंट वेलफेयर, डीन अकादमिक तथा विश्वविद्यालय के एससी/एसटी सेल को भी भेजी है।

 

छात्र की प्रमुख मांगें:

पीड़ित छात्र ने विश्वविद्यालय प्रशासन से निम्न मांगें की हैं—

 

– गौरव सिंह की नियुक्ति एवं अधिकारिक स्थिति तत्काल सार्वजनिक की जाए।

– उन्हें सभी छात्र समूहों के एडमिन पद से हटाया जाए।

– पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।

– दोषियों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

– छात्र को पुनः सभी आधिकारिक शैक्षणिक गतिविधियों और समूहों में शामिल किया जाए।

– जातिगत भेदभाव एवं मानसिक उत्पीड़न की स्वतंत्र जांच कर न्याय सुनिश्चित किया जाए।

 

अब प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार

विश्वविद्यालय परिसर में यह मामला तेजी से चर्चा का विषय बनता जा रहा है। छात्र संगठनों और सामाजिक न्याय से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो यह मामला बड़े स्तर पर तूल पकड़ सकता है। अब सबकी निगाहें विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति कार्यालय पर टिकी हैं कि वे इस संवेदनशील मामले में क्या कदम उठाते हैं।

उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता, सामाजिक समानता और छात्रों की गरिमा बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाए और दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

Share This Article
Leave a Comment