खेती के साथ ही किसान पशुपालन, मुर्गीपालन एवं मत्स्यपालन की गतिविधियां अपनाएं – संयुक्त संचालक कृषि
मुर्गीपालन विषय पर आधारित कृषक संगोष्ठी का किया गया आयोजन, आदान सामग्री वितरित

राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशुरोग संस्थान भोपाल द्वारा प्रायोजित अनुसूचित जनजाति उपयोजना अंतर्गत वित्तपोषित ग्रामीण उद्यमिता के लिए मुर्गीपालन विषय पर आधारित कृषक संगोष्ठी एवं आदान सामग्री वितरण कार्यक्रम का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र शहडोल में किया गया। कार्यक्रम में संयुक्त संचालक कृषि शहडोल श्री जे एस पेन्द्राम ने कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ गाँवों की प्रधानता है। जीविकोपार्जन का मुख्य साधन कृषि के साथ-साथ कृषि आधारित व्यवसाय जैसे पशुपालन, कुक्कुट पालन, डेयरी उद्योग, फल उत्पादन, मशरूम उत्पादन इत्यादि हैं। गाँवों की अधिसंख्यक आबादी सीमांत व लघु कृषक अथवा भूमिहीन श्रमिकों की है जिनको गाँव में पर्याप्त रोजगार न होने के कारण शहरों की तरफ पलायन करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान आर्थिक परिवेश में खेती के साथ-साथ अन्य व्यवसायों को अपनाना गाँवों के विकास के लिए नितांत आवश्यक है। कुक्ुकट पालन व्यवसाय ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्र के बेरोजगार नवयुवकों को रोजगार उपलब्ध कराने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक सह प्रमुख डॉ. मृगेंद्र सिंह ने किसानों को बताया कि भारत में विश्व की सबसे बड़ी कुक्कुट आबादी है, अधिकांश कुक्कुट आबादी छोटे, सीमान्त और मध्यम वर्ग के किसानों के पास है। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में कुक्कुट पालन से किसानों की आय में बढ़ोत्तरी तथा पोषण व खाद्य सुरक्षा की सुनिश्चितता आदि अनेक फायदे हैं। माँस व अण्डों का प्रबन्धन करना तथा किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने के उद्देश्य से यह प्रशिक्षण आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने किसानों को बताया कि मुर्गीपालन कम पूंजी में शुरू होने वाला लाभकारी व्यवसाय है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित हो सकते हैं। वैज्ञानिक तरीके से मुर्गीपालन अपनाने पर कम समय में अच्छी आय अर्जित की जा सकती है साथ-साथ मुर्गी का मल का उपयोग बटन मशरूम उत्पादन हेतु कम्पोस्ट बनाने तथा खाद के रूप में खेतो में प्रयोग से फसल की उत्पादकता में बढ़ोत्तरी होती है। भारत में कुपोषण एवं गरीबी की समस्या को दूर करने के लिए पारम्परिक मुर्गी पालन अथवा घर के पिछवाड़े मुर्गी पालन की यह पद्धति प्राचीन काल से प्रचलित है। इसमें प्रायः 5-20 मुर्गियों का छोटा सा समूह एक परिवार के द्वारा पाला जाता है, जो घर एवं उसके आस-पास में अनाज के गिरे दाने, झाड़-फूसों के बीच कीड़े-मकोड़े, घास की कोमल पत्तियाँ तथा घर की जूठन आदि खाकर अपना पेट भरती है। इसके रात्रि विश्राम के लिए घर के टूटे-फूटे भाग व खंडहर काम में लाए जाते है। इस प्रकार घर के रखरखाव एवं खाने-पीने पर कोई खास खर्च नही आता है। साथ ही ग्रामीण परिवारों के लिए उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन स्रोत उपलब्ध हो जाता है एवं कुछ मात्रा में मांस व अंडा बेच लेने से परिवार को अतिरिक्त आमदनी हो जाती है। कुक्कुट पालन किसानों की आर्थिक अवस्था सुधारने का महत्वपूर्ण उद्योग है। कार्यक्रम में आसपास के गांवों से आए किसानों, युवाओं एवं महिला स्व-सहायता समूहों की उत्साहजनक सहभागिता रही। प्रशिक्षण कार्यक्रम में डॉ. अल्पना शर्मा, श्री दीपक चौहान डॉ. नितिन सिंघई, श्री ऋषि राज नेगी, श्री भगवत प्रसाद पन्द्रे, का विशेष योगदान रहा।


