बहन का दर्द: “भैया, कल से किसको कहूँगी भैया?”

ßवह एक कोने में खड़ी थी। सबसे अलग। सबसे चुप। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर वह रो नहीं रही थी। वह बस देख रही थी—अपने भैया को, जो आखिरी बार उसके सामने थे।
वही भैया, जो उसे साइकिल चलाना सिखाता था। वही भैया, जो जब वह गिर जाती थी तो उठाकर कहता था—”कोई बात नहीं, फिर कोशिश कर।” वही भैया, जो दुकान से चॉकलेट लाकर छुपाकर रखता था, सिर्फ उसके लिए। वही भैया, जो उसके दोस्तों से लड़ पड़ता था अगर कोई उसे चिढ़ाता था।
आज वही भैया… बेजान पड़े थे। उसके सामने। और वह कुछ नहीं कर सकती थी।
वह धीरे से आगे बढ़ी। उसने भैया के पैर छुए। वही पैर जो कभी उसके पीछे-पीछे दौड़ा करते थे। वही पैर जो उसे स्कूल छोड़ने जाया करते थे। आज बिल्कुल ठंडे। बिल्कुल बेजान।
उसने मुँह ढक लिया। वह चाहकर भी रो नहीं पा रही थी। गला रुँध गया था। आवाज़ नहीं निकल रही थी। बस एक शब्द उसके दिल में गूंज रहा था—”भैया… भैया… भैया…”
जब एंबुलेंस जाने लगी, वह दौड़ी। माँ की तरह नहीं, पिता की तरह नहीं। वह बहन थी, उसका दर्द अलग था। वह चीखी नहीं, रोई नहीं, बस इतना कहा—”भैया, तू जा रहा है तो बता, कल से मैं किसको कहूँगी भैया?”
एंबुलेंस चली गई। वह वहीं खड़ी रह गई। उसे लगा जैसे उसका बचपन भी उस एंबुलेंस के साथ जा रहा है। जैसे वह सारी यादें, वह सारी खुशियाँ, वह सारे पल—सब धुंधले हो रहे हैं।
उस रात जब घर लौटी, उसने अपने कमरे में जाकर देखा। वहाँ एक साइकिल खड़ी थी। भैया वाली। वह साइकिल जिस पर वह कभी पीछे बैठती थी। उसने उसे छुआ। फिर बैठ गई ज़मीन पर। फिर रोई। इतना रोई कि उसकी आँखों ने उस रात सारे 13 साल का दर्द बाहर निकाल दिया।
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आज वह घर सूना है। पिता की चुप्पी है, माँ के आँसू हैं, बहन का सन्नाटा है। तीन दिल, एक ही दर्द। तीन रिश्ते, एक ही चीख।
पर क्या पता… शायद जहाँ भी है हरीश, वहाँ से वह देख रहा हो। देख रहा हो अपने पापा को, अपनी माँ को, अपनी बहन को। और कह रहा हो—”रो मत… मैं आज़ाद हूँ। और तुम्हारे दिल में हमेशा रहूँगा।”


