Ad imageAd image
d84ef9efc3d53b57ca3a957694261ad58b2c2b9e

मध्य प्रदेश की अमूल्य भूमियों का रक्षक ही बन बैठा था भक्षक — आदिवासियों की कब्जे की  भूमि पर अज्ञात व्यक्तियों के कब्जे का खेल?

admin
7 Min Read
इस खबर को शेयर करें

आदिवासियों की कब्जे की  भूमि पर अज्ञात व्यक्तियों के कब्जे का खेल?

मध्य प्रदेश की अमूल्य भूमियों का रक्षक ही बन बैठा था भक्षक

1981 की योजना की आड़ में  जमीनों  पर फर्जी व्यवस्थापन के आरोप, ग्राम नकुनी से उठी उच्चस्तरीय जांच की मांग

- Advertisement -
Ad imageAd image

धारा 165, 170-A और 170-B के उल्लंघन की आशंका, 15 से 20 एकड़ भूमि के व्यवस्थापन और विक्रय पर खड़े हुए गंभीर सवाल

वास्तविक कब्जधारियों के नाम के जगह पटवारी  के द्वारा अपने परिजनों एवं रिश्तेदारों के नाम झूठा कब्जा किया गया दर्ज

राजस्व विभाग की आँखों में धुल झोकते हुए अवैधानिक तरीके झूठा कब्ज़ा दर्ज कर किया गया फर्जी व्यवस्थापन

भूमिहीन बताने वाले फर्जी व्यक्तियों के पास पूर्व से है पट्टे की भूमि

- Advertisement -
Ad imageAd image

ब्यौहारी (जिला शहडोल)। गरीबों और आदिवासियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के उद्देश्य से शासन द्वारा आवंटित की गई भूमि को लेकर ग्राम नकुनी में गंभीर विवाद सामने आया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि वर्ष 1981 में भूमिहीन एवं आदिवासी परिवारों के लिए आवंटित की की जाने वाली भूमियों को पटवारी द्वारा अपने परिवार जनों एवं रिश्तेदारों के नाम फर्जी कब्ज़ा दर्ज कर  नियमों के विपरीत व्यवस्थापन कर वास्तविक पात्र हितग्राहियों के अधिकारों को प्रभावित किया गया। मामले में तत्कालीन राजस्व अमले की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

पीड़ित आदिवासी जनों  के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भूमिहीन एवं आदिवासी परिवारों को आजीविका के लिए कृषि भूमि उपलब्ध कराने की 20 सूत्रीय योजना के तहत ग्राम नकुनी में पात्र परिवारों को लगभग 5-5 एकड़ भूमि प्रदान किए जाने का प्रावधान किया गया था। योजना का उद्देश्य उन परिवारों को भूमि अधिकार देना था, जिनके पास स्वयं की कोई कृषि भूमि नहीं थी और जो वर्षों से भूमि पर खेती कर जीवनयापन कर रहे थे।

वास्तविक कब्जाधारियों के अधिकारों पर प्रश्नचिन्ह

ग्रामीणों का आरोप है कि जिन आदिवासी एवं भूमिहीन परिवारों का भूमि पर वास्तविक कब्जा था और जो पीढ़ियों से खेती करते आ रहे थे, उनकी जगह राजस्व अभिलेखों में कथित रूप से अन्य व्यक्तियों के नाम दर्ज किए गए। आरोप है कि पूर्व  पटवारी ने अपने पद का प्रभाव इस्तेमाल करते हुए अपने सगे-संबंधियों एवं रिश्तेदारों के नाम लगभग 15 से 20 एकड़ भूमि का व्यवस्थापन करा लिया।

यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल शासन की मूल मंशा के विपरीत होगा, बल्कि भूमिहीन एवं आदिवासी परिवारों के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

भूमि विक्रय और भू-माफियाओं की भूमिका पर भी सवाल

ग्रामीणों का दावा है कि वर्षों बाद अब वही भूमि कथित रूप से भू-माफियाओं की सक्रियता के कारण विभिन्न व्यक्तियों को बेची जा रही है। हाल ही में लगभग 15 एकड़ भूमि, जिस पर आदिवासी परिवारों का लंबे समय से कब्जा एवं खेती-बाड़ी बताई जा रही है, उसके विभिन्न हिस्सों का विक्रय किए जाने की चर्चा क्षेत्र में बनी हुई है।

ग्रामीणों का आरोप है कि भूमि से जुड़े पुराने अभिलेखों और वर्तमान रिकॉर्ड के बीच गंभीर विसंगतियां हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।

सीमांकन और कब्जा दिलाने की कार्रवाई पर उठे सवाल

मामले का सबसे संवेदनशील पक्ष यह है कि जिस भूमि पर आदिवासी परिवार वर्षों से खेती कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं, उसी भूमि पर सीमांकन कर अन्य लोगों को कब्जा दिलाने की प्रक्रिया चलाए जाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ राजस्व अधिकारियों की कथित मिलीभगत से ऐसी कार्रवाई की जा रही है, जिससे वास्तविक कब्जाधारियों में भय और असुरक्षा का माहौल है।

क्या कहता है मध्यप्रदेश भू-राजस्व कानून?

राजस्व जानकारों के अनुसार यदि आदिवासी भूमि का हस्तांतरण, व्यवस्थापन अथवा नामांतरण नियमों के विपरीत किया गया है, तो मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 के तहत इसकी जांच और निरस्तीकरण की कार्रवाई संभव है।

– धारा 165 आदिवासी भूमि के संरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान प्रदान करती है।

– धारा 170-A एवं 170-B के अंतर्गत यदि आदिवासी भूमि फर्जी दस्तावेजों, कपटपूर्ण तरीके अथवा नियमों के उल्लंघन के माध्यम से हस्तांतरित पाई जाती है, तो सक्षम राजस्व अधिकारी भूमि को मूल हकदार अथवा उसके उत्तराधिकारियों को वापस दिलाने की कार्रवाई कर सकते हैं।

– राजस्व अभिलेखों में गलत प्रविष्टियां, तथ्य छिपाना अथवा कूटरचित रिकॉर्ड तैयार करना पाए जाने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध विभागीय एवं विधिक कार्रवाई का भी प्रावधान है।

ग्रामीणों की मांग: विशेष जांच दल गठित हो

ग्रामीणों ने कलेक्टर शहडोल, संभागायुक्त तथा राजस्व विभाग से मांग की है कि पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। उन्होंने वर्ष 1981 से वर्तमान तक के खसरा, खतौनी, व्यवस्थापन आदेश, नामांतरण अभिलेख, सीमांकन प्रतिवेदन और भूमि विक्रय से संबंधित दस्तावेजों की जांच कराने की मांग की है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच कराई जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि भूमि का वास्तविक अधिकार किसे था, व्यवस्थापन किन परिस्थितियों में हुआ और क्या शासन की मंशा के अनुरूप पात्र हितग्राहियों को लाभ मिला था या नहीं।

अब सबकी नजर प्रशासन पर

मामला केवल भूमि विवाद का नहीं, बल्कि आदिवासी एवं भूमिहीन परिवारों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। ऐसे में क्षेत्रवासियों की निगाहें अब प्रशासन पर टिकी हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या दशकों पुराने राजस्व रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाएगी, या फिर आदिवासियों की पुश्तैनी खेती और उनके अधिकारों पर उठ रहे सवाल अनुत्तरित ही रह जाएंगे

Share This Article
Leave a Comment