एक आदिवासी लड़की… जिसने अपने लिए नहीं, पूरे समाज के लिए लड़ाई लड़ी!

ओडिशा के मलकानगिरी के घने जंगलों से निकली एक साधारण सी लड़की
Jayanti Buruda
घर में 11 भाई-बहन… इतनी गरीबी कि पढ़ाई एक सपना लगती थी…
लेकिन इस लड़की का सपना अलग था।
उसे नाम या पैसा नहीं चाहिए था,
वह चाहती थी —
• उसके समाज तक शिक्षा पहुँचे
• हर घर तक स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँचें
• आदिवासी समुदाय भी सम्मान के साथ जी सके
इस सपने को पूरा करने के लिए उसने चुना पत्रकारिता का रास्ता।
ना पैसे, ना संसाधन, ना कोई सहारा…
फिर भी वह लड़ी
परिवार से, समाज से, हालात से…
और घर छोड़कर निकल पड़ी अपने सपनों की ओर।
2017 में Network of Women in Media India की Fellowship ने उसकी आवाज़ को एक मंच दिया…
और फिर उसकी कलम ने दुनिया को सच दिखाना शुरू किया।
उसने उन कहानियों को सामने लाया-
जहाँ महिलाएँ आज भी जंगलों में बिना अस्पताल के बच्चे जन्म देती हैं,
जहाँ बच्चे बिना बिजली और सड़क के पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
2018 में उसने “बड़ा दीदी यूनियन” शुरू किया-:
• महिलाओं को सुरक्षा के बारे में जागरूक किया
* Menstruation पर खुलकर बात की
• Sanitary Pads बाँटे और जागरूकता फैलाई
यही नहीं…
उसने समाज द्वारा ठुकराई गई 10–15 बेटियों को अपनाया,
उन्हें घर दिया, शिक्षा दी और एक नया जीवन दिया।
*उसका सपना यहीं नहीं रुका*
उसने “Jungle Raani Initiative” शुरू किया,
ताकि उसके समाज से एक नहीं, हजारों जयंती निकल सकें।
*आज वह BBC के लिए रिपोर्ट कर चुकी हैं,
और Forbes India की W-Power List में भी जगह बना चुकी हैं।
वह सिर्फ एक पत्रकार नहीं बनी…
वह अपने लोगों की आवाज़ बन गई।
अगर बदलाव लाना है, तो जयंती बुरुड़ा जैसी सोच अपनानी होगी
अगर समाज बदलना है, तो किसी एक को आगे आना ही होगा
ऐसी कहानियाँ सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं होतीं…
बल्कि आगे बढ़ाने के लिए होती हैं।
इस कहानी को ज़रूर शेयर करें
ताकि हर आदिवासी बेटी को ये यकीन हो जाए कि
वो भी अपनी कहानी खुद लिख सकती है।
— साधना उईके


