‘ *जल गंगा संवर्धन’ की हकीकत उजागर: लाखों खर्च, लेकिन साखी का ‘मतहा तालाब’ बदहाल*
ब्यौहारी (शहडोल), 29 अप्रैल 2026 | विशेष रिपोर्ट: *विनय द्विवेदी*
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन के उद्देश्य से चलाए जा रहे ‘जल गंगा संवर्धन’ अभियान की जमीनी सच्चाई एक बार फिर सवालों के घेरे में है। शहडोल जिले के जनपद पंचायत ब्यौहारी अंतर्गत ग्राम पंचायत साखी में स्थित ऐतिहासिक ‘मतहा तालाब’ की स्थिति इस अभियान के दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।
*आस्था का केंद्र बना उपेक्षा का शिकार*
मतहा माता मंदिर प्रांगण में स्थित यह प्राचीन तालाब कभी ग्रामीणों की जीवनरेखा हुआ करता था। सैकड़ों लोग प्रतिदिन यहां स्नान करते, पीने का पानी लेते और मंदिर में भगवान को अर्पित करने हेतु जल यहीं से लाते थे। लेकिन आज यही तालाब बदहाली की मिसाल बन चुका है।
*तालाब नहीं, काई का मैदान*
स्थल निरीक्षण के दौरान पाया गया कि तालाब की सतह पर मोटी काई और खरपतवार की परत जम चुकी है। दूर से देखने पर यह तालाब कम, हरे मैदान जैसा अधिक प्रतीत होता है। पानी की गुणवत्ता इस कदर बिगड़ चुकी है कि न यह पशुओं के पीने लायक रहा, न ही किसी अन्य उपयोग के योग्य।
*लाखों रुपये खर्च, काम नदारद*
*स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है* कि ‘जल गंगा संवर्धन’ के नाम पर पंचायत द्वारा लाखों रुपये खर्च किए जा चुके हैं। लेकिन धरातल पर कोई ठोस कार्य दिखाई नहीं देता। न तो तालाब की ठीक से सफाई हुई, न ही गहरीकरण। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह बजट कहां और कैसे खर्च हुआ?
“सरकार जल संरक्षण के लिए बड़ी योजनाएं चला रही है, लेकिन पंचायत स्तर पर केवल कागजी कार्रवाई हो रही है। मतहा तालाब में लाखों खर्च होने के बाद भी सिर्फ काई ही नजर आ रही है।”
*बढ़ता जल संकट, खतरे में भविष्य*
क्षेत्र में पहले से ही जल संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में जल स्रोतों की उपेक्षा भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। यदि समय रहते तालाबों का संरक्षण और पुनर्जीवन नहीं किया गया, तो आने वाले समय में हालात और भी विकट हो सकते हैं।
*निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग*
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि तालाब की सफाई के नाम पर हुए खर्च की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही, तालाब का शीघ्र गहरीकरण और समुचित सफाई सुनिश्चित की जाए, ताकि वर्षा जल का संचयन बेहतर तरीके से हो सके और क्षेत्र में जल संकट को कम किया जा सके।
‘जल गंगा संवर्धन’ जैसी महत्वाकांक्षी योजना तभी सफल हो सकती है जब उसका क्रियान्वयन ईमानदारी से हो। साखी का मतहा तालाब इस बात का उदाहरण है कि योजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर सही तरीके से लागू न हों, तो उनका उद्देश्य अधूरा ही रह जाता है।





