बूंद-बूंद को तरसते गांव, कागज़ों में बहता विकास
भीषण गर्मी में ‘जल जीवन मिशन’ की खुली पोल, प्यास से जूझ रहे ग्रामीण
निवास (मण्डला)। यस न्यूज़ संवाददाता।
आसमान से बरसती आग और धरती पर सूखते जलस्रोतों के बीच मण्डला जिले के आदिवासी अंचल निवास विकासखंड के कई गांव आज प्यास की त्रासदी झेल रहे हैं। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि इंसानों के साथ-साथ मवेशियों तक के सामने पानी का संकट खड़ा हो गया है। गांवों में महिलाएं और बच्चे कई किलोमीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं, लेकिन जिम्मेदार तंत्र मानो गहरी नींद में सोया हुआ है।
निवास जनपद पंचायत की 35 ग्राम पंचायतों में से कई गांव इन दिनों जल संकट की मार झेल रहे हैं। ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों द्वारा लगातार शिकायतें और आवेदन देने के बावजूद समस्या जस की तस बनी हुई है। आरोप है कि प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ फाइलों में योजनाओं का आंकड़ा सजाने में व्यस्त हैं, जबकि जमीनी हकीकत पूरी तरह सूखी पड़ी है।

गांव प्यासे, अधिकारी मौन:
भीषण गर्मी में जब लोगों को सबसे ज्यादा राहत और मदद की जरूरत है, तब न प्रशासन गांवों में दिखाई दे रहा है और न ही वे जनप्रतिनिधि, जिन्होंने चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए थे। ग्रामीणों का कहना है कि नेताओं की मौजूदगी सिर्फ मंचों और भाषणों तक सीमित रह गई है, जबकि गांवों की प्यास अब चीख बन चुकी है।
‘जल जीवन मिशन’ बना सवालों के घेरे में:
सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन, नल-जल योजना और जल निगम परियोजनाओं की सच्चाई अब गांवों की सूखी टंकियों और बंद पड़े नलों से सामने आने लगी है। कहीं पाइप लाइन अधूरी पड़ी है, कहीं सड़क किनारे पाइप फेंके हुए हैं, तो कहीं केवल नल-टोंटी लगाकर काम पूरा दिखा दिया गया। करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे किए गए, लेकिन ग्रामीणों के हिस्से आज भी सिर्फ इंतजार और निराशा ही आई।

ग्रामीणों का आरोप है कि विकास योजनाओं के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हुई और भ्रष्टाचार ने असली उद्देश्य को निगल लिया। सवाल उठ रहे हैं कि जिन योजनाओं का उद्घाटन बड़े उत्साह से हुआ, उनका पानी आखिर जनता तक क्यों नहीं पहुंचा?
अब सिर्फ पानी नहीं, जवाबदेही की भी लड़ाई:
गांवों में बढ़ते आक्रोश के बीच अब सवाल केवल पानी का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और जवाबदेही का भी है। आखिर कब तक ग्रामीण भीषण गर्मी में बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करते रहेंगे? क्या प्रशासन समय रहते जागेगा, या फिर सरकारी दावे और योजनाएं सिर्फ कागज़ों तक ही सीमित रह जाएंगी?
प्यासे गांवों की गूंजता सवाल —
“करोड़ों की योजनाओं का पानी आखिर गया कहां?”





