ऐतिहासिक फैसला: खाकी पर लगा दाग धुला, 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा!
तमिलनाडु (इंद्र यादव) मदुरै की अदालत ने सत्तनकुलम कस्टोडियल डेथ केस में एक ऐसा फैसला सुनाया है जिससे पूरे देश की रूह कांप गई है। वर्दी की आड़ में ‘गुंडागर्दी’ करने वाले 9 पुलिसकर्मियों को अदालत ने मौत की सजा सुनाई है। यह फैसला साफ संदेश देता है कि रक्षक अगर भक्षक बनेगा, तो कानून उसे बख्शेगा नहीं।
क्या था पूरा मामला
यह कहानी शुरू होती है 19 जून 2020 को, जब लॉकडाउन के नियम लागू थे।
झूठा आरोप: 59 वर्षीय जयराज को पुलिस ने सिर्फ इसलिए पकड़ा क्योंकि उनकी मोबाइल की दुकान कथित तौर पर तय समय से कुछ मिनट ज्यादा खुली थी। (बाद में जांच में पता चला कि यह आरोप पूरी तरह झूठा था)।
अहंकार की आग: जब बेटा बेनिक्स अपने पिता को बचाने थाने पहुंचा, तो उसने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाया। पुलिसकर्मियों को एक आम नागरिक का सवाल पूछना इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने बाप-बेटे दोनों को कालकोठरी में डाल दिया।
थाने के अंदर की वो खौफनाक रात
अदालत में जो गवाहियां और सबूत सामने आए, वो किसी भी इंसान का दिल दहला देने के लिए काफी हैं.
बर्बरता की हद: जयराज और बेनिक्स को पूरी रात बेरहमी से पीटा गया।
मानवता शर्मसार: एक महिला कॉन्स्टेबल ने हिम्मत दिखाकर गवाही दी कि पुलिसकर्मियों ने पिता-पुत्र को इतना लहूलुहान कर दिया था कि उन्हीं के कपड़ों से थाने के फर्श पर पड़ा खून साफ करवाया गया।
चोटों के निशान: पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, बेनिक्स के शरीर पर 13 और जयराज के शरीर पर 17 गंभीर घाव थे। इसी टॉर्चर की वजह से 22 और 23 जून को अस्पताल में दोनों की मौत हो गई।
किसे मिली मौत की सजा
अदालत ने इंस्पेक्टर से लेकर कॉन्स्टेबल तक, इस अपराध में शामिल हर हाथ को सजा दी है.
एस. श्रीधर (इंस्पेक्टर)
पी. रघु गणेश (सब-इंस्पेक्टर)
के. बालकृष्णन (सब-इंस्पेक्टर)
एस. मुरुगन (हेड कॉन्स्टेबल)
ए. सामिदुरई (हेड कॉन्स्टेबल)
एम. मुथुराजा (कॉन्स्टेबल)
एस. वेल मुथु (कॉन्स्टेबल)
एस. चेल्लादुरई (कॉन्स्टेबल)
एक्स. थॉमस फ्रांसिस (कॉन्स्टेबल)
हमें क्या सीखने की जरूरत है? (जनहित में जारी)
यह मामला सिर्फ एक अपराध नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों की जीत है।
कानून का डर जरूरी है: पुलिस का काम सुरक्षा करना है, प्रताड़ित करना नहीं। अगर कोई पुलिसकर्मी अपनी सीमा लांघता है, तो कानून उसे फांसी के फंदे तक ले जाने की ताकत रखता है।
आवाज उठाना जरूरी है: अगर महिला कॉन्स्टेबल ने सच नहीं बोला होता और सोशल मीडिया पर लोगों ने आवाज नहीं उठाई होती, तो शायद यह केस फाइलों में दब जाता।
जयराज और बेनिक्स तो वापस नहीं आएंगे, लेकिन इस ‘ऐतिहासिक इंसाफ’ ने पीड़ित परिवार को सुकून और समाज को एक भरोसा दिया है कि अंधेरा चाहे कितना भी घना हो, न्याय का सूरज जरूर उगता है।
सतर्क रहें, अपने अधिकारों को जानें!


