ऋषि पंचमी — सप्तऋषियों के प्रति कृतज्ञता का पावन पर्व

ऋषि पंचमी भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण व्रत है। इस दिन सप्तऋषियों और माता अरुंधती का पूजन किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत आत्मशुद्धि, संयम, सदाचार तथा जाने-अनजाने हुए दोषों के प्रायश्चित्त की भावना से जुड़ा है।
2026 में ऋषि पंचमी 15 सितंबर, मंगलवार को है। पंचमी तिथि 15 सितंबर की सुबह से प्रारंभ होकर 16 सितंबर की सुबह तक रहेगी; उदयातिथि के अनुसार व्रत 15 सितंबर को रखा जाएगा।
🕉️ किसका पूजन होता है?
ऋषि पंचमी पर इन सप्तऋषियों का पूजन किया जाता है—
1. महर्षि कश्यप
2. महर्षि अत्रि
3. महर्षि भारद्वाज
4. महर्षि विश्वामित्र
5. महर्षि गौतम
6. महर्षि जमदग्नि
7. महर्षि वशिष्ठ
इनके साथ माता अरुंधती का भी पूजन किया जाता है।
🌺 सरल पूजा विधि
1. प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. पूजा स्थान को स्वच्छ करके चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं।
3. सप्तऋषियों तथा माता अरुंधती की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।
4. जल अथवा पंचामृत से प्रतीकात्मक अभिषेक करें।
5. चंदन, अक्षत, पुष्प, माला, धूप और दीप अर्पित करें।
6. सातों ऋषियों का नाम लेकर श्रद्धापूर्वक पूजन करें।
7. सप्तऋषियों को अर्घ्य अर्पित करके मंत्र-जप करें।
8. ऋषि पंचमी की व्रत-कथा पढ़ें या सुनें और अंत में आरती करें।
9. अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखें और यथाशक्ति दान-पुण्य करें।
महाराष्ट्र की परंपरा में इस दिन ऋषि पंचमी की सब्जी का विशेष महत्व माना जाता है तथा कुछ परंपराओं में बिना हल से बोई गई भूमि में उत्पन्न शाक आदि ग्रहण करने का विधान बताया गया है।
🔱 सप्तऋषि पूजन मंत्र
ॐ सप्तर्षिभ्यो नमः॥
इसके बाद सातों ऋषियों के नाम से जप किया जा सकता है—
ॐ कश्यपाय नमः।
ॐ अत्रये नमः।
ॐ भारद्वाजाय नमः।
ॐ विश्वामित्राय नमः।
ॐ गौतमाय नमः।
ॐ जमदग्नये नमः।
ॐ वशिष्ठाय नमः।
ॐ अरुन्धत्यै नमः॥
🌸 सप्तऋषि अर्घ्य मंत्र
कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
दहन्तु पापं सर्वं गृह्णन्त्वर्घ्यं नमो नमः॥
अर्थात—महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ इन सप्तऋषियों को नमन है। वे हमारे सभी दोषों का क्षय करें और हमारे द्वारा अर्पित अर्घ्य को स्वीकार करें।
🪔 ऋषि पंचमी अष्टक
कश्यपं मुनिशार्दूलं, अत्रिं ज्ञानप्रदायकम्।
भारद्वाजं तपोनिष्ठं, विश्वामित्रं तपोधनम्॥
गौतमं धर्मनिष्ठं च, जमदग्निं तपस्विनम्।
वशिष्ठं ब्रह्मतेजस्विनं, अरुंधतीं पतिव्रताम्॥
सप्तर्षीणां स्मरेन्नित्यं, श्रद्धाभक्तिसमन्वितः।
ज्ञानं बुद्धिं च मे देहि, सदाचारं च सर्वदा॥
अज्ञानदोषनाशाय, ऋषीणां चरणं भजे।
सर्वमंगलसिद्ध्यर्थं, सप्तर्षीभ्यो नमो नमः॥
ॐ सप्तर्षिभ्यो नमः॥ 🌺
ऋषि पंचमी का वास्तविक संदेश केवल व्रत तक सीमित नहीं है—यह ऋषि-परंपरा, ज्ञान, तप, संयम और सदाचार के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है।





