अगस्त के बाद (सितंबर-अक्टूबर) का समय शतावरी की खेती (Shatavari Farming) की शुरुआत करने के लिए बहुत उपयुक्त माना जाता है। इस समय मानसून की भारी बारिश कम हो जाती है, जिससे शतावरी के नाजुक पौधों (Seedlings) के गलने का खतरा कम हो जाता है और मिट्टी में उपयुक्त नमी बनी रहती है।
यहाँ शतावरी की खेती से जुड़ी A to Z संपूर्ण जानकारी दी गई है:
1. खेती का सही समय (Timing)
• नर्सरी तैयार करना: वैसे तो इसकी नर्सरी मई-जून में डाली जाती है।
• खेत में रोपाई (Transplantation): यदि आपके पास नर्सरी के पौधे तैयार हैं या आप सरकारी/निजी रजिस्टर्ड नर्सरी से पौधे ला रहे हैं, तो 20 अगस्त के बाद यानी सितंबर से अक्टूबर का समय खेत में रोपाई के लिए सबसे उत्तम है।
2. जलवायु और मिट्टी (Climate & Soil)
• जलवायु: शतावरी एक बेहद सहनशील फसल है। यह उष्णकटिबंधीय (Tropical) और उप-उष्णकटिबंधीय दोनों जलवायु में अच्छी बढ़ती है।
• मिट्टी: इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी (Sandy Loam Soil) सबसे बेहतरीन मानी जाती है क्योंकि इसमें शतावरी की जड़ें आसानी से फैलती हैं।
• जल निकासी: खेत में जलभराव (Waterlogging) बिल्कुल नहीं होना चाहिए, अन्यथा जड़ें सड़ सकती हैं। मिट्टी का pH मान 6.0 से 8.0 के बीच होना चाहिए।
3. खेत की तैयारी और रोपाई विधि
1. जुताई: खेत की 2-3 बार गहरी जुताई करें ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए।
2. खाद: आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ 10-15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या केंचुआ खाद (Vermicompost) मिलाएँ।
3. मेड़ (Ridge) बनाना: शतावरी की रोपाई हमेशा मेड़ बनाकर करनी चाहिए।
• मेड़ से मेड़ की दूरी: 4 से 5 फीट
• पौधे से पौधे की दूरी: 2 फीट
4. रोपाई: तैयार मेड़ों पर पौधों को सावधानीपूर्वक लगाएँ और तुरंत हल्की सिंचाई करें।
4. सिंचाई और देखभाल (Irrigation & Care)
• सिंचाई: शुरुआती दिनों में हफ्ते में एक बार सिंचाई करें। सर्दियों में 15-20 दिनों के अंतराल पर और गर्मियों में जरूरत के अनुसार पानी दें। टपक सिंचाई (Drip Irrigation) इसके लिए सबसे बेहतर है।
• सपोर्ट (Staking): शतावरी एक बेलदार पौधा है। जब बेलें बड़ी होने लगें, तो इन्हें बांस या सूत की रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ाना चाहिए ताकि धूप अच्छी मिले और विकास तेज हो।
• निराई-गुड़ाई: जड़ों के अच्छे फैलाव के लिए समय-समय पर खरपतवार निकालते रहें।
5. रोग और कीट प्रबंधन
• शतावरी में बहुत कम बीमारियां लगती हैं।
• कभी-कभी जड़ गलन (Root Rot) की समस्या आती है। इससे बचने के लिए खेत में पानी न रुकने दें और ट्राइकोडर्मा (Trichoderma) का इस्तेमाल करें।
6. लागत, पैदावार और कमाई (Economics)
• समय अवधि: यह लगभग 18 से 24 महीने (1.5 से 2 साल) की फसल है।
• लागत: एक एकड़ में करीब 8,000 से 10,000 पौधे लगते हैं। खेत की तैयारी, पौधे और लेबर मिलाकर प्रति एकड़ लगभग ₹40,000 से ₹60,000 का खर्च आता है।
• पैदावार: 2 साल बाद एक एकड़ से लगभग 40 से 50 क्विंटल सूखी जड़ें प्राप्त हो सकती हैं।
• कमाई: बाजार में सूखी शतावरी की कीमत गुणवत्ता के आधार पर ₹250 से ₹400 प्रति किलोग्राम तक हो सकती है। इस तरह एक एकड़ से अच्छी स्थिति में ₹5 लाख से ₹8 लाख तक का सकल मूल्य प्राप्त हो सकता है। वास्तविक शुद्ध मुनाफा बाजार भाव, उपज और कुल लागत पर निर्भर करेगा।
महत्वपूर्ण बातें
1. मार्केट लिंक: खेती शुरू करने से पहले पतंजलि, डाबर जैसी आयुर्वेदिक कंपनियों या स्थानीय जड़ी-बूटी व्यापारियों से बायबैक एग्रीमेंट (Buyback Contract) या बाजार की मांग की जानकारी जरूर कर लें।
2. सर्टिफिकेशन और प्रशिक्षण: औषधीय खेती के लिए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) या अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से संपर्क कर सब्सिडी और ट्रेनिंग की जानकारी लें।

3. पौधों की गुणवत्ता: रोपाई के लिए स्वस्थ और प्रमाणित पौधों का ही चयन करें।
4. जल निकासी: खेत में बारिश या सिंचाई का पानी लंबे समय तक जमा न होने दें।
5. बाजार: खेती शुरू करने से पहले बिक्री का बाजार और संभावित खरीदार तय करना बेहतर रहेगा।





