Ad imageAd image
d84ef9efc3d53b57ca3a957694261ad58b2c2b9e

बोलती परछाइयाँ में स्मृतियों, संवेदनाओं और जीवन-दर्शन की गहन अभिव्यक्ति

admin
9 Min Read
इस खबर को शेयर करें

बोलती परछाइयाँ में स्मृतियों, संवेदनाओं और जीवन-दर्शन की गहन अभिव्यक्ति

समीक्षक : उमेश कुमार सिंह

समकालीन हिंदी साहित्य में संस्मरण और आत्मानुभव आधारित लेखन की एक विशिष्ट परंपरा रही है, जिसमें लेखक अपने जीवन के अनुभवों, सामाजिक परिवेश और मानवीय संबंधों को साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हुई साहित्यकार सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ की कृति “बोलती परछाइयाँ” पाठकों के सामने आती है। यह पुस्तक केवल संस्मरणों का संकलन भर नहीं है, बल्कि जीवन की स्मृतियों, अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं का एक सजीव साहित्यिक दस्तावेज है। बिलासा प्रकाशन, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का प्रथम संस्करण वर्ष 2025 में प्रकाशित हुआ है।

“बोलती परछाइयाँ” शीर्षक अपने आप में अत्यंत अर्थपूर्ण और सांकेतिक है। परछाइयाँ सामान्यतः स्मृतियों, अतीत के अनुभवों और मन के भीतर छिपी उन भावनाओं का प्रतीक होती हैं जो समय के साथ धुंधली अवश्य हो जाती हैं, किंतु पूरी तरह समाप्त नहीं होतीं। लेखक ने इन परछाइयों को “बोलती” बना कर यह संकेत दिया है कि जीवन के बीते हुए अनुभव हमारे भीतर लगातार संवाद करते रहते हैं। वे स्मृतियों के रूप में हमारे व्यक्तित्व और सोच को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार पुस्तक का शीर्षक केवल आकर्षक नहीं, बल्कि दार्शनिक अर्थों से परिपूर्ण प्रतीक बन जाता है, जो पाठक को आरंभ से ही पुस्तक के भाव संसार की ओर आकर्षित करता है।

- Advertisement -
Ad imageAd image

इस कृति की विषयवस्तु अत्यंत व्यापक और विविधतापूर्ण है। लेखक ने अपने जीवन के अनेक अनुभवों को कथा और संस्मरण के रूप में प्रस्तुत किया है। कहीं बचपन की मासूम स्मृतियाँ हैं, तो कहीं युवावस्था के संघर्ष और जीवन की कठोर वास्तविकताओं का चित्रण है। कई प्रसंगों में ग्रामीण परिवेश की झलक मिलती है, जहाँ सामाजिक संबंधों की सहजता, पारिवारिक मूल्यों की गरिमा और सामूहिक जीवन की संस्कृति स्पष्ट दिखाई देती है। वहीं कुछ रचनाओं में बदलते सामाजिक परिवेश, आधुनिक जीवन की चुनौतियों और मानवीय संबंधों में आ रही जटिलताओं को भी अभिव्यक्ति मिली है। यही कारण है कि पुस्तक की कथाएँ पाठक के अनुभव संसार से सहज रूप से जुड़ जाती हैं।

लेखक सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ की भाषा इस कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। उनकी अभिव्यक्ति सरल, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण है। भाषा में अनावश्यक अलंकरण या जटिलता नहीं है, बल्कि एक संवादात्मक सहजता है जो पाठक को कथा के भीतर खींच लेती है। कई स्थानों पर लोकभाषा और क्षेत्रीय शब्दों का प्रयोग रचनाओं को और अधिक जीवंत बना देता है। इससे पाठक को यह अनुभव होता है कि वह किसी साहित्यिक पाठ को पढ़ने के बजाय जीवन के वास्तविक अनुभवों को सुन रहा है। यही सरलता और आत्मीयता इस पुस्तक को व्यापक पाठक वर्ग के लिए सहज रूप से ग्राह्य बनाती है।

कथन शैली की दृष्टि से भी यह कृति उल्लेखनीय है। इसमें संस्मरणात्मकता का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। लेखक घटनाओं को केवल वर्णित नहीं करते, बल्कि उनके पीछे छिपे भावनात्मक और सामाजिक संदर्भों को भी सामने लाते हैं। कई प्रसंगों में ऐसा प्रतीत होता है मानो लेखक स्वयं पाठक से संवाद कर रहे हों और अपने जीवन की स्मृतियों को साझा कर रहे हों। इस शैली के कारण पाठक कथा के भीतर केवल दर्शक नहीं रहता, बल्कि वह स्वयं उस अनुभव का सहभागी बन जाता है। यही विशेषता इस कृति को सामान्य संस्मरण संग्रह से अलग बनाती है।

“बोलती परछाइयाँ” का सबसे सशक्त पक्ष मानवीय संवेदनाओं का गहन चित्रण है। लेखक ने पात्रों और घटनाओं के माध्यम से जीवन की विविध भावनाओं को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। कहीं रिश्तों की ऊष्मा है, कहीं संघर्ष की पीड़ा, कहीं स्मृतियों की मिठास है और कहीं समय के साथ बदलते जीवन की विडंबनाएँ। इन रचनाओं को पढ़ते हुए पाठक केवल घटनाओं को नहीं देखता, बल्कि उन भावनाओं को भी महसूस करता है जो जीवन को अर्थ प्रदान करती हैं। यही भावात्मक गहराई इस पुस्तक को एक विशेष साहित्यिक ऊँचाई प्रदान करती है।

पुस्तक में लेखक की सामाजिक और नैतिक दृष्टि भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने अपने अनुभवों के माध्यम से समाज में मौजूद कई विसंगतियों, बदलते सामाजिक मूल्यों और मानवीय संबंधों की जटिलताओं की ओर संकेत किया है। हालांकि लेखक कहीं भी प्रत्यक्ष उपदेश देने का प्रयास नहीं करते। वे घटनाओं और पात्रों के माध्यम से पाठक को स्वयं विचार करने का अवसर देते हैं। यही संतुलित दृष्टिकोण पुस्तक को विचारोत्तेजक बनाता है।

साहित्यिक दृष्टि से यह कृति संस्मरण, कहानी और जीवन-दर्शन का एक सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। इसमें लेखक ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि वे केवल व्यक्तिगत न रहकर व्यापक सामाजिक अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं। यही कारण है कि पाठक इन रचनाओं में कहीं न कहीं अपने जीवन की झलक भी देख सकता है। यह गुण किसी भी साहित्यिक कृति की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।

“बोलती परछाइयाँ” केवल मनोरंजन प्रदान करने वाली पुस्तक नहीं है, बल्कि यह पाठक को अपने जीवन, अपनी स्मृतियों और अपने अनुभवों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करती है। इस कृति को पढ़ते हुए पाठक कई बार अपने अतीत की उन स्मृतियों से भी जुड़ जाता है जिन्हें वह शायद भूल चुका होता है। यही साहित्य की वास्तविक शक्ति है कि वह मनुष्य को उसके अनुभवों और संवेदनाओं से पुनः जोड़ देता है।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ हिंदी साहित्य में निरंतर सक्रिय और सृजनशील रहे हैं। उनकी लेखनी में जीवन के प्रति संवेदनशील दृष्टि और सामाजिक सरोकार स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। “बोलती परछाइयाँ” उनकी रचनात्मकता का एक सशक्त उदाहरण है। उल्लेखनीय है कि हाल ही में उनकी दूसरी काव्य एवं संस्मरण संकलन पुस्तक “गुनगुनाते शब्द” भाग दो का भी प्रकाशन और विमोचन किया गया है। इस पुस्तक का प्रकाशन मांडा पब्लिशर्स, दिल्ली द्वारा किया गया है। इससे स्पष्ट है कि लेखक की साहित्यिक यात्रा निरंतर गतिशील और सृजनशील बनी हुई है।

समग्र रूप से देखा जाए तो “बोलती परछाइयाँ” एक ऐसी कृति है जो स्मृतियों और अनुभवों के माध्यम से जीवन की गहरी सच्चाइयों को उजागर करती है। इसमें लेखक ने अपने अनुभवों को अत्यंत ईमानदारी, आत्मीयता और संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। यह पुस्तक पाठक को जीवन के उन पक्षों से परिचित कराती है जो सामान्यतः साधारण प्रतीत होते हैं, किंतु वास्तव में मनुष्य के अस्तित्व और अनुभव की गहरी परतों को अपने भीतर समेटे हुए होते हैं।

इस दृष्टि से “बोलती परछाइयाँ” हिंदी साहित्य में अनुभवजन्य लेखन की एक महत्वपूर्ण कृति के रूप में देखी जा सकती है। यह पुस्तक न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए पठनीय है, बल्कि उन सभी पाठकों के लिए भी उपयोगी है जो जीवन, स्मृति और मानवीय संबंधों की संवेदनशील अभिव्यक्ति को समझना चाहते हैं। ऐसी कृतियाँ साहित्य को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं बनातीं, बल्कि उसे जीवन के गहन अनुभवों का दर्पण भी बना देती हैं।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ केवल एक संवेदनशील साहित्यकार ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना से जुड़े हुए सक्रिय व्यक्तित्व भी हैं। वे कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहकर समाज सेवा और जनजागरण के कार्यों में लगातार योगदान देते रहे हैं। देश के विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में उनके लेख नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं, जिनमें सामाजिक मुद्दों और जनजागरण से जुड़े विषय प्रमुखता से उठाए जाते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में जीवन की सच्चाई, मानवीय संवेदना और सामाजिक दृष्टि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। मेरा मानना है कि समाज से जुड़े लेखक की लेखनी अधिक प्रभावशाली और सार्थक होती है, जो पाठकों को सोचने और समाज के प्रति जागरूक बनने के लिए प्रेरित करती है।

पुस्तक का नाम : बोलती परछाइयाँ

लेखक : सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’

प्रकाशक : बिलासा प्रकाशन, बिलासपुर

समीक्षक : उमेश कुमार सिंह

Share This Article
Leave a Comment