शिवलिंग के वास्तविक अर्थ पर भ्रांतियों का निराकरण : पं. राजकुमार मिश्र
वाराणसी। वर्तमान समय में शिवलिंग के संबंध में प्रचलित कुछ भ्रांतियों को दूर करने हेतु संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट के संस्थापक एवं अध्यक्ष पंडित राजकुमार मिश्र द्वारा एक महत्वपूर्ण लेख प्रस्तुत किया गया है। इस लेख में “लिंग” शब्द के शास्त्रीय अर्थ को स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि इसे गुप्तेन्द्रिय के रूप में समझना पूर्णतः गलत है।

लेख में उद्धृत शास्त्रीय प्रमाण के अनुसार :—
“आकाश लिंगमित्याहुः, पृथ्वी तस्य पीठिका।
आलयः सर्वभूतानां, लयाल्लिंगमुच्यते।।”
अर्थात आकाश को लिंग कहा गया है तथा पृथ्वी उसकी पीठिका (जलहरी) है। समस्त प्राणियों का आधार एवं लयस्थान होने के कारण उसे ‘लिंग’ कहा जाता है।
इसी संदर्भ में ब्रह्मसूत्र का उल्लेख करते हुए कहा गया है :— “आकाशस्तल्लिंगात्” (१/१/२२), जिसका तात्पर्य है कि आकाश ही उसका लिंग (चिह्न) है।
पंडित मिश्र ने अपने लेख में “शिव-रहस्य” का उल्लेख करते हुए यह भी बताया कि भगवान शंकर की साकार मूर्ति की सौ वर्षों तक भक्ति-भाव से पूजा करने पर जो फल प्राप्त होता है, वही फल एक दिन के शिवलिंग पूजन से प्राप्त हो जाता है।
उन्होंने समाज से आग्रह किया है कि शास्त्रसम्मत ज्ञान को अपनाते हुए शिवलिंग के विषय में फैली भ्रांतियों का त्याग करें और सनातन धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझें।
(यह लेख संकल्प रामराज्य सेवा ट्रस्ट के संस्थापक/अध्यक्ष पंडित राजकुमार मिश्र द्वारा लिखा गया है।)


