सॉन्ग रिव्यू: मां से जुदाई के असहनीय दर्द और रूहानी रिश्ते को बयां करता बलधीर माहला का नया गाना ‘मावां’

फरीदकोट (एलेक्जेंडर डी’सूज़ा): पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री में जहां इन दिनों गन-कल्चर, तड़क-भड़क और कमर्शियल गानों की होड़ मची है, वहीं पारिवारिक रिश्तों की अहमियत और रूह को छू लेने वाले साफ-सुथरे गानों का अकाल सा पड़ा है। इसी बीच, ‘बलधीर माहला रिकॉर्ड्स’ की पेशकश के तहत रिलीज हुआ नया गाना ‘मावां’ (Mawaan) एक ऐसा बेमिसाल और कलात्मक प्रोजेक्ट है, जो न सिर्फ सुनने वाले को भावुक कर देता है बल्कि उसकी आंखों को भी नम कर जाता है। यह गाना केवल मनोरंजन का जरिया नहीं, बल्कि मां की ममता, उससे जुदाई के असहनीय दर्द और एक बच्चे के दिल में ताउम्र रहने वाले नासूर की जीती-जागती दास्तां है।
भट्टी झंडेवाला की कलम से निकले रूहानी बोल
गाने के बोल मशहूर गीतकार भट्टी झंडेवाला ने लिखे हैं। उन्होंने बेहद सरल लेकिन बेहद गहरे शब्दों में उस कड़वे सच को बयां किया है, जिससे हर वो शख्स सीधे तौर पर जुड़ सकता है जिसने कम उम्र में अपनी मां को खो दिया हो। गाने की लाइनें-“छोटी उमरे तुरगियां मावा, बुक्कल दा निघ ते ठंडियां छावां”-सीधे कलेजे को चीरती हैं। गीतकार ने पंजाबी संस्कृति के उन ठेठ और पारंपरिक दृश्यों (जैसे मां का तवे पर रोटी सेंकना, वट्टाडी घूरी और छैने में चूड़ी तोड़ना) को इतनी शिद्दत से पिरोया है कि सुनते ही पुरानी यादें आंखों के सामने तैरने लगती हैं।
बलधीर माहला की संजीदा गायकी और सनी साईवन का संगीत
इस गीत को खुद बलधीर माहला ने अपनी मखमली और दर्द भरी आवाज से सजाया है, साथ ही इसका खूबसूरत कंपोजिशन भी उन्होंने खुद ही तैयार किया है। बलधीर की गायकी में एक ऐसा ठहराव और संजीदगी है, जो इस बेहद गंभीर विषय के साथ पूरा न्याय करती है। आलाप और अंतरे में उनकी आवाज का उतार-चढ़ाव सुनने वाले के दिल में दर्द को और गहरा कर देता है।
वहीं, संगीतकार सनी साईवन का दिया म्यूजिक गाने के माहौल को और अधिक भावुक और गंभीर बनाता है। संगीत की खूबी यह है कि यह कहीं भी शब्दों (लिरिक्स) पर हावी नहीं होता, बल्कि बैकग्राउंड में बजने वाली इसकी मधुर और उदास धुनें श्रोताओं को एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं।
बेमिसाल सिनेमैटोग्राफी और शानदार निर्देशन:
वीडियो डायरेक्टर गुरबाज गिल के कुशल निर्देशन में गाने की सिनेमैटोग्राफी बहुत ही सादगी और खूबसूरती के साथ की गई है, जो गाने की मूल आत्मा से पूरी तरह मेल खाती है। राज मान की क्रिस्प और सधी हुई एडिटिंग ने वीडियो की कहानी के प्रवाह को टूटने नहीं दिया, जिससे दर्शक शुरू से अंत तक स्क्रीन से बंधे रहते हैं। एक प्रोड्यूसर के तौर पर भी बलधीर माहला ने आज के व्यावसायिक दौर में इस तरह के संजीदा विषय पर निवेश कर साफ-सुथरी और गुणवत्तापूर्ण गायकी के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई है, जो वाकई काबिले-तारीफ है।
निष्कर्ष (रिव्यू रेटिंग)
“भट्टी दी अर्ज, माहले दा फर्ज, जनम तो दर्ज, तेरा आई खराज…” जैसी बेहद प्रभावशाली लाइनों के साथ खत्म होने वाला यह गाना हर इंसान को अपनी मां की अहमियत और उसकी कमी का अहसास कराता है। ‘बलधीर माहला रिकॉर्ड्स’ की यह पेशकश लंबे समय तक संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करेगी। पंजाबी म्यूजिक इंडस्ट्री को आज ऐसे ही और अर्थपूर्ण और पारिवारिक गानों की सख्त जरूरत है। अगर आप रूह को सुकून देने वाला और भावनाओं से ओत-प्रोत संगीत सुनना चाहते हैं, तो ‘मावां’ गाना एक बार जरूर सुनें।
रिपोर्ट: एलेक्जेंडर डी’सूज़ा (फरीदकोट)
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