स्वतंत्रता दिवस विशेष आप हम सभी के लिए – यू. के. मिश्रा

 

 

 

 

स्वतंत्रता दिवस विशेष आप हम सभी के लिए – यू. के. मिश्रा

फिर बने गुलशन गुलिस्ताँ ये इबादत है मेरी
हो अमन के सिलसिले बस ये ही है चाहत मेरी

कौन हिन्दू कौन मुस्लिम सब यही के नूर हैं
इस वतन पे जीना मरना बस यही आदत मेरी

कोई जल कर राख होगा कोई दफ़न हो जायेगा
लाख पहनावा अलग हो सब कफ़न हो जायेगा

सब बने हैं इस ज़मीं से फिर ज़मीं हो जायेंगे
महफूज़ हो ये सरज़मी तो फिर से हो राहत मेरी

अपनी आज़ादी सहेजे इस वतन के वास्ते
साथ मिलकर चल चले सब हो जो मुश्किल रास्ते

क्यूँ करे अपनों से रंजिश ये ज़मी अपनी ही है
वतन के दुश्मन ये समझें अब तो है आफत मेरी

बाँट कर इस सरज़मी को क्या कोई रह पाएगा
कश्मीर के टुकड़े करोगे क्या कोई सह पाएगा

नक़्शे में कतरन बचेगी चाक करते जाओगे
हाथ कुछ भी न लगेगा दर्द ही सब पाओगे

वक़्त की है ये नज़ाक़त फिर खड़े हो एक साथ
धर्म जाति से परे हो हिन्दुस्तान की ही बात

बेड़ियाँ हैं कुछ अलग सी अब समझने का वक़्त
मेरे अपने मुझको समझें तब तो हो बरक़त मेरी

फिर बने गुलशन गुलिस्ताँ ये इबादत है मेरी
हो अमन के सिलसिले बस ये ही है चाहत मेरी
#IndependenceDay